भारत में इनकम टैक्स सिस्टम
को मजबूत बनाने के लिए सरकार ने TDS (Tax Deducted at Source) की व्यवस्था लागू की है। इसका उद्देश्य है कि जहां भी
व्यक्ति को आय हो रही है, वहीं पर कुछ
प्रतिशत टैक्स पहले ही काट लिया जाए और सरकार को जमा करवा दिया जाए।
TDS एक सरल व्यवस्था लगती है, लेकिन व्यवहार में इससे जुड़ी कई गंभीर समस्याएँ सामने आती हैं – जैसे कि गलत TDS कटना, गलत पैन पर जमा होना, TDS क्लेम ना हो पाना, और सबसे आम – रिफंड में लंबी देरी।

इस लेख में हम इन सभी
समस्याओं को गहराई से समझेंगे और जानेंगे कि एक आम आदमी कैसे इससे बच सकता है।
· TDS की मूल समझ: TDS का मतलब है Tax Deducted at Source — यानी जहां से आय उत्पन्न हो रही है, वहीं पर पहले से ही टैक्स काट लिया जाए। यह व्यवस्था वेतन, बैंक ब्याज, किराया, पेशेवर शुल्क, कमीशन, कांट्रैक्ट आदि
पर लागू होती है।
उदाहरण के लिए:
अगर किसी व्यक्ति को Rs. 50,000 की पेशेवर फीस मिल रही है, तो क्लाइंट उस
पर 10% यानी Rs. 5,000 को TDS के रूप में काटकर Rs. 45,000 ही भुगतान करेगा और Rs. 5,000 सरकार को जमा करेगा।
·
TDS में गड़बड़ी:
1. गलत PAN पर TDS जमा होना: अगर TDS काटने वाले (Deductor) ने आपका PAN नंबर गलत दर्ज किया, तो वह TDS आपके खाते में दिखाई ही
नहीं देगा। नतीजतन आप उसे ITR में क्लेम नहीं
कर पाएँगे।
2. TDS की रिपोर्टिंग Form 26AS / AIS में नहीं होना: कई बार TDS तो कट जाता है, लेकिन Deductor उसे टाइम पर फाइल नहीं करता या TDS रिटर्न ही
दाखिल नहीं करता, तो आपकी इनकम
में वह दिखेगा नहीं — जिससे रिफंड में समस्या आएगी।
3. TDS कटना लेकिन क्लेम नहीं करना: बहुत से लोग TDS क्लेम करना भूल जाते हैं, खासकर अगर उनके पास multiple income sources हैं (जैसे: Fixed Deposit पर ब्याज, फ्रीलांसिंग आदि)। इससे
रिफंड छूट जाता है।
·
रिफंड में देरी
के मुख्य कारण:
1.
ITR में गलत बैंक डिटेल्स देना (IFSC code या खाता नंबर)
2.
AIS/26AS से इनकम और TDS mismatch होना
3.
TDS अभी तक Deductor द्वारा जमा नहीं किया गया
हो
4.
TDS claim ज़्यादा दिखाना जिससे processing में अटकाव आए
आइए एक उदाहरण से इसे समझने
का प्रयास करते हैं :
श्री रमेश, एक प्राइवेट टीचर हैं। उन्हें सालभर में Rs. 6 लाख की फीस अलग-अलग संस्थानों से मिली। सभी संस्थानों ने 10% TDS काटकर Rs. 5.4 लाख का भुगतान
किया और Rs. 60,000 सरकार को जमा किया।
जब रमेश जी ने ITR फाइल किया, तब केवल Rs. 40,000 ही उनके Form 26AS में दिख रहा था, जबकि उन्होंने Rs. 60,000 क्लेम कर लिया।
नतीजा यह हुआ कि उनका
रिफंड अटक गया और Income Tax Department ने उनसे explanation मांगा। बाद में पता चला कि एक
संस्था ने TDS फाइल करना भूल
गई थी।
· TDS रिफंड
में देरी – किसका फायदा और किसका नुकसान?
Ø फायदे
(किसे लाभ होता है?):
1.
सरकार को तुरंत टैक्स मिल जाता है:
v
TDS की व्यवस्था के कारण सरकार को पहले
ही टैक्स प्राप्त हो जाता है, जिससे टैक्स संग्रहण (compliance)
बेहतर होता है।
2.
कम आय वालों को रिफंड मिल सकता है:
v यदि आपकी सालाना आय कर मुक्त सीमा से कम है और फिर भी TDS कटा
है, तो आप उसे ITR के ज़रिए रिफंड के रूप में वापस पा सकते हैं।
Ø नुकसान
(किसे हानि होती है?):
1.
TDS समय पर क्लेम न करने पर पैसा फँस
जाता है:
· यदि आपने सही समय पर TDS क्लेम नहीं किया, या गलती से छोड़ दिया, तो वह पैसा सरकार के पास ही अटका रह जाता है।
2.
रिफंड वर्षों तक अटका रह सकता है:
· कई बार Rs. 10,000 से Rs. 50,000 या उससे अधिक तक का रिफंड कई महीनों या वर्षों तक नहीं मिल
पाता, जिससे मानसिक और वित्तीय परेशानी बढ़ती है।
3.
Liquidity यानी नकद प्रवाह पर असर:
· रिफंड अटकने की स्थिति में आपकी जेब में पैसा नहीं होता, जिससे रोज़मर्रा की
ज़रूरतों या निवेश/बिज़नेस की योजनाओं पर असर पड़ता है।
4.
आयकर विभाग से नोटिस या जांच का खतरा:
· अगर आपके TDS क्लेम और फॉर्म 26AS / AIS में मिलान नहीं बैठता, तो आपकी ITR में scrutiny (जांच) या verification की संभावना बढ़ जाती
है।
·
इन समस्याओं से
बचाव के लिए सुझाव:
1. अपना PAN, नाम और बैंक
डिटेल्स सही दर्ज करें: हर Deductor को समय पर PAN दें और उससे कहें कि वही PAN TDS रिटर्न में फाइल करे।
2. Form 26AS, AIS और TIS को समय-समय पर जांचें: आपकी सारी TDS एंट्री वहाँ दिखनी चाहिए।
यदि कोई गड़बड़ी हो तो Deductor से संपर्क
करें।
3. ITR फाइल करने से पहले मिलान ज़रूर करें: ITR में TDS क्लेम तभी करें
जब वो 26AS और AIS में दिख रहा हो।
4. जिन Deductors ने TDS नहीं फाइल किया – उन्हें
ईमेल या पत्र भेजें: यह आपका अधिकार है कि आप उनसे कहें कि वे समय से TDS जमा करें और रिटर्न फाइल करें।
5. ITR सही समय पर और सही फॉर्म में फाइल करें: गलत फॉर्म, पुराने आंकड़े
या incomplete जानकारी से रिफंड रोका जा
सकता है।
6. Netbanking या traces वेबसाइट से अपनी Tax Credit
regularly देखें।
इस प्रकार हम पाते हैं कि
TDS की व्यवस्था टैक्स कलेक्शन
को आसान और सुरक्षित बनाने के लिए है, लेकिन इसमें थोड़ी सी भी
लापरवाही आपको नोटिस, रिफंड में देरी और ब्याज नुकसान तक पहुँचा सकती है।
यदि आप चाहते हैं कि आपका मेहनत का पैसा समय पर वापस मिले, तो हर वित्तीय वर्ष में निम्नलिखित 3 काम अवश्य करें:
1.
Form 26AS और AIS की जाँच करें।
2.
ITR सही फॉर्म और
सही आंकड़ों के साथ फाइल करें।
3.
Deductors से समय पर TDS जमा करवाएँ।
समझदारी और सजगता से आप इन
दिक्कतों से बच सकते हैं और TDS आपके लिए
सिरदर्द नहीं, एक Tax Saving और Planning का ज़रिया बन सकता है।
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*** अस्वीकरण: इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी हैं और gyanpublication.com या इसके स्वामी की आधिकारिक राय नहीं हैं। यह केवल सूचना व शिक्षा हेतु है, इसे कानूनी या व्यावसायिक सलाह न मानें। पाठकों को सलाह दी जाती है कि वे जानकारी को स्वतंत्र रूप से सत्यापित करें और आवश्यकता पड़ने पर किसी योग्य विशेषज्ञ की सलाह लें। लेखक, प्रकाशक या वेबसाइट किसी भी त्रुटि या परिणाम के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे।
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